Tuesday, 10 November 2015

REGARDS....BE HAPPY ALWAYS & DON'T WORRY....IN EVERY WAYS....IN MANY WAYS....JUST TOWARDS SO MANY......जय हो....सादर नमन.......WITH DUE RESPECT.....FROM ALL OF US AT 'FACEBOOK'....WE HOPE ENJOY CELEBRATING THE FESTIVAL OF LIGHTS WITH OUR LOVED ONES....इस संकल्प के साथ कि प्रत्येक शब्द मात्र सकारात्मक सिद्ध हो...हमेशा-हमेशा के लिए...मात्र आनंद के लिए....प्रत्येक शब्द में निमंत्रण है....."गुरु कृपा ही केवलम्"....भले पधारो सा...हार्दिक स्वागत...MOST WELCOME...विनायक समाधान @ 91654-18344...(INDORE/UJJAIN/DEWAS)....REGARDS..

Vinayak Samadhan: THERE ARE SO MANY STORIES REGARDING.....

THERE ARE SO MANY STORIES REGARDING.....
जय हो.....खरगोश और कछुए की तुलना सिर्फ गति के कारण होती है....वर्ना दोनों में कोई मेल-जोल नहीं....मात्र तुलनात्मक उदाहरण....पूर्ण काल्पनिक...इनसे से उल्लू बेहतर मात्र लक्ष्मी-वाहन कहला कर सबसे अलग....पूर्ण-संतुष्ट वह भी रात के अँधेरे में....जैसे बिमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है……जैसे धन कछुए की तरह आता है और खरगोश की तरह जाता है…….यह अक्षरश: सत्य है कि बीमारी और दुख-कष्ट बिन मौसम बरसात की तरह चले आते हैँ…….आते समय तो खरगोश जैसी तेजी से आकर मनुष्य को अनायास ही घेर लेते हैं और दिन-रात परेशान करते हैं…….तब हम चाहते हैं कि जिस फुर्ती से वे आए हैं उसी तरह पलक झपकते ही वे चले जाएँ…….ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि वे तो मटकते-मटकते कछुए की-सी चाल चलते हुए और हमारे धैर्य की परीक्षा लेकर ही वापिस लौटते हैं…..
बिमारी, कष्ट, दुख और परेशानियाँ हमारे इस भौतिक जीवन का ही हिस्सा हैं…….चाहे-अनचाहे हर स्थिति में हर मनुष्य को इन्हें भोगना पड़ता है………यहाँ उसकी इच्छा नहीं पूछी जाती…….पूर्वजन्म-कृत कर्मों के ही अनुसार उसे बस केवल अपने भोगों को भोगकर उनसे मुक्त होना होता है…….जब इन कुकर्मों को स्वेच्छा से प्रसन्नता पूर्वक हम करते हैं तो उनका दुष्परिणाम भी तो हमें अकेले को ही भोगना होता है……सृष्टि का यह अटल नियम है कि जैसे हम बोते हैं वैसा ही काटते हैंयथा बीजम् तथा निष्पत्ति.….इसी तरह हमने अपने कर्मों की जैसी भी फसल पूर्व जन्मों में बोयी थी वैसी ही तो काटनी पड़ेगी……..यानि उसी हिसाब से ये बिमारी, कष्ट और परेशानी हमें भोगकर ही काटने होंगे…….यदि सपर्पण का सम्मान होता है तो हंसते हुए उस ईश्वरीय इच्छा के आगे अपना सिर झुका देंगे तो मन की पीड़ा कुछ हद तक कम हो जाएगीइसके लिए समय की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती…….ये सब हमारे अपने भोगों का खट्टा, तीखा व कटु भोग है जो समयानुसार हमें मिल रहा हैअब हम धन की बात करते हैं……सारा जीवन मनुष्य पापड़ बेलता रहता है…….झूठ-सच, छल-फरेब सब करता है……वह चोरी करने और डाका डालने तक से परहेज नहीं करता……रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी तक बन जाता है……दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह परिश्रम करता है…….तब जाकर अपना व घर-परिवार का पोषण कर पाता है……कहते हैं पानी की एक-एक बूँद के डलते रहने से मटका भरता है उसी प्रकार पैसा-पैसा करके धन को जोड़ा जाता है……अर्थात कछुए की तरह मन्थर गति से या सुस्त चाल से चलते हुए सालों-साल लग जाते है उसे अपने लिए पर्याप्त धन एकत्रित करने में……खून-पसीने से कमाए हुए धन में यदि सेंध लग जाए अर्थात् मनुष्य को या उसकी सन्तान, किसी को भी नशे, रेस आदि की बुरी लत लग जाए तो  धन की बरबादी खरगोश की चाल से होने लगती है…….उसके खजाने में बड़े-बड़े छेद हो जाते है......अपने पूर्व जन्मों में किए गए सत्कर्मों अथवा कुकर्मो की कुण्डली हम नहीं बना  सकते पर अपने वर्तमान में ऐसा प्रयास हमें अवश्य करना चाहिए कि खरगोश की तरह भागकर आए दुख हमें न दबोचने पाएँ……उनके कछुए की तरह जाने की भी हमें  कभी प्रतीक्षा न करनी पड़े…..इसी प्रकार एक-एक पैसा करके कछुए की चाल की तरह जोड़े धन में कोई ऐसा छेद न होने पाए कि वह खरगोश की चाल से भागता हुआ हमें मुँह चिढ़ाता हुआ हमसे दूर चला जाए….सहज आमने-सामने...विषय समझ में आया तो ठीक वर्ना ट्यूटर बदलने की सहज सुविधा...और यह भी हो सकता कि स्वाध्याय या स्वयं अध्ययन करे....(SELF-STUDY)…..फुर्सत के क्षणों में शब्दों का आदान-प्रदान अर्थात चर्चा का योग, समय अनुसार.....उच्च, समकक्ष या मध्यम....शुद्ध रूप से....स्वयं का निर्णय हो सकता है...आमने-सामने...face to face...शब्दों का सम्मान...पूर्ण स्वतंत्रता के साथ....शब्दों को व्यक्त करने का अधिकार अवसर मिलने पर ही सार्थक होता है....समस्त अवसर, प्रश्नों पर आधारित हो सकते है  और प्रश्न करने का अवसर होना चाहिए......सादर नमन्...जय हो..."विनायक-चर्चा" हेतु हार्दिक स्वागत....विनायक समाधान @ 91654-18344....




Vinayak Samadhan: THE PRIZES ARE JUST ALONG WITH RESPECTS.....WITH D...

Vinayak Samadhan: THE PRIZES ARE JUST ALONG WITH RESPECTS.....WITH D...: THE PRIZES ARE JUST ALONG WITH RESPECTS.....WITH DUE RESPECT....REGARDS..... जय हो …. सादर नमन....हार-जीत की बात में मजा न लेते हुए, मान-स...
THE PRIZES ARE JUST ALONG WITH RESPECTS.....WITH DUE RESPECT....REGARDS.....
जय हो….सादर नमन....हार-जीत की बात में मजा न लेते हुए, मान-सम्मान की चर्चा जारी रखते है.....यह मानते हुए कि हार-जीत से स्नेह का क्षय हो सकता है.....वर्तमान में सम्पूर्ण राष्ट्र में "सम्मान और पुरस्कार" का आदान-प्रदान का प्रस्तुतिकरण का प्रसारण हो रहा है...चर्चा करने हेतु शब्दों का चयन करने में अत्यधिक कठिनाई का सामना करना पड़ा...उन मित्रो का सामना कैसे हो ? जो बड़े-बड़े समारोह का सामना कर चुके हो.....ससम्मान....सादर निमंत्रण के साथ.....मात्र कला के भक्त.....जिन्होंने निभाई सिर्फ और सिर्फ "भक्ति"......अर्थात वाद्य यंत्र....सीखने की ललक....प्रारंभिक स्थिति...क्या बजता है ?...कोई फर्क नहीं पड़ता...परन्तु कितनी देर बजा सकते है, मायने रखने लायक है, क्योंकि मायने बदलते रहते है....मात्र जमने का प्रयास....जड़त्व स्वयं का...स्वयं द्वारा....परन्तु एक समय बाद....कितनी देर क्या बजाते है ???....और उसके बाद मात्र क्या बजाते है ?....लय-ताल....मात्र संगम...."उस्ताद की एक झलक ही काफ़ी है"....मात्र झलक की ललक कहती है..."वाह, उस्ताद वाह"....सहज सम्मान...उपसर्ग हो या प्रत्यय....कला की समरसता....एक से अनेक की सहज यात्रा...अनेक नाम, अनेक रूप, अनेक युक्तियाँ, अनेक उपकार, अनेक शिष्य...अनेक चिंतन...अनेक चित्र....अनेक मित्र...समस्त परकोटों के मध्य लय-ताल...निम्न का परकोटा (सेवक-तुल्य) कहे "वाह"....उच्च का परकोटा (सेवा-तुल्य) कहे "वाह"....सामन्जस्य का सहज दायित्व....सहज केंद्र-बिंदु.....तब तो कहलाये "उस्ताद"....सिर्फ स्वयं का अनुभव...अपनी खुद की योग्यता के अनुसार सम्मान को स्वीकार करना....साहस का कार्य....पुरस्कार सिर्फ सम्मान का माध्यम है.....कटु-वचन के बदले में कटु-वचन सम्भव है परन्तु कटु-वचन के बदले में मधुर-वचन मात्र सम्मान हो सकता है....यही तो वह पुरस्कार है...हमेशा के लिए....भला लौटाना कैसे सम्भव है ???...और बेहद सामान्य बात, मामूली......यह सत्य-वचन समस्त निष्ठावान मित्रों का संबोधन है....और निष्ठा का निष्कर्ष सिर्फ और सिर्फ...जड़त्व...."रघुकुल रीत सदा चली आयी....प्राण जाय पर वचन न जाए"....उस्ताद के सिद्धांत...सिद्धांत से सम्मान, सम्मान से पुरस्कार, पुरस्कार से ख्याति, ख्याति से पुनरावृत्ति....सम्पूर्ण घटनाक्रम में भला अनादर की सम्भावना कहाँ ???....उस्ताद का यह अनुभव हो सकता है कि अनादर को भी स्नेह समझने का प्रयास उत्तम साहस हो सकता है....तब उस्ताद कह उठता है...."सत्यमेव जयते"....पुरस्कार में सम्मान.....न हार का डर, न जीत का लालच....बस भक्ति की ललक....ओर बन्दगी यही 'झुकती रहे पलक'....पलकों की छाँव में....पल दो पल के लिये...इस संकल्प के साथ कि प्रत्येक शब्द मात्र सकारात्मक सिद्ध हो...हमेशा-हमेशा के लिए..."जा को राखें साइयां, मार सके ना कोई"....'वाहे गुरु' को समर्पित शब्द प्रसाद के रूप में सभी मित्रो को सादर आवंटित या वितरित....ना हार का डर, ना जीत का लालच....धर्म में मात्र पीछे ना हटने का सहज प्रयास करना होता है, स्वतः आगे ले जाने का कार्य तो धर्म स्वयं ही सहज करता है...यही सामान्य बात, सामान्य रूप से कहने का प्रयास किया गया है....प्रपंच या व्यवसाय कदापि नहीं....असंभव....'गुरु दीक्षा' के प्रसाद या पुरस्कार को बेचना संभव नही  है...आप महसूस कर सकते है कि प्रत्येक चर्चा में समाचार पत्रों का, पत्रिकाओं का, टेलीविजन का, राजनीति का, समाज का जिक्र सिर्फ और सिर्फ धर्म  के दायरे में ही किया गया है...तथा धर्म को सम्प्रदाय से पूर्ण मुक्त रखा गया है....अर्थात चर्चा मात्र आनंद के लिए....प्रत्येक शब्द में निमंत्रण है...और प्रत्येक चित्र में चरित्र है...अर्थात..."गुरु कृपा ही केवलम्"....भले पधारो सा...हार्दिक स्वागत...MOST WELCOME...विनायक समाधान @ 91654-18344...(INDORE/UJJAIN/DEWAS)....